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GAZAL जब कभी तेरा नाम लेते है

जब कभी तेरा नाम लेते है दिल से हम इंतिकाम लेते है मेरे बरबादियों के अफ़साने मेरे यारों के नाम लेते है बस यही एक जुल्म है अपना हम मोहब्बत से काम लेते है हर कदम पर गिरे मगर सिखा कैसे गिरतों को थाम लेते है हम भटककर जुनूं की राहों मे अक्ल से इंतिकाम लेते है Gazal by सरदार अंजुम

Gazal मैनें कुछ तुमसे कहा हो तो जबां जल जाये

कितनी पलकों की नमी मांगके लाई होगी प्यास तब फूल की शबनम ने बुझाई होगी इक सितारा जो गिरा टूंट के उंचाई से किसी जर्रे की हंसी उसने उडाई होगी आंधिया हैं के मचलती है,चली आती है किसी मुफ़लीस ने कही शम्मा जलाई होगी मैनें कुछ तुमसे कहा हो तो जबां जल जाये किसी दुश्मन ने ये अफ़वाह उडाई होगी हम तो आहट के भरोसे पे सहर तक पहुंचे रातभर आपको भी नींद ना आई होगी Gazal by unknown

Gazal मैं होश में था तो फिर उसपे मर गया कैसे

मैं होश में था तो फिर उसपे मर गया कैसे, ये जहर मेरे लहू में उतर गया कैसे, कुछ उसके दिल में लगावट जरूर थी वरना, वो मेरा हाथ दबाकर गुजर गया कैसे, जरूर उसके तसव्वुर की राहत होगी, नशे में था तो मैं अपने ही घर गया कैसे, जिसे भुलाये कई साल हो गये कलीम, मैं आज उसकी गली से गुजर गया कैसे, Gazal by कंधपुरी

GAZAL तेरी आखों में हमने क्या देखा

दिल के दीवारों दर पे क्या देखा बस तेरा नाम ही लिखा देखा तेरी आखों में हमने क्या देखा कभी कातिल कभी खुदा देखा अपनी सुरत लगी पराई सी जब कभी हमने आईना देखा हाय अंदाज तेरे रूकने का वक्त को भी रूका रूका देखा तेरे जाने में और आने में हमने सदियों का फ़ासला देखा फिर ना आया खयाल जन्नत का जब तेरे घर का रास्ता देखा Gazal by  सुदर्शन फ़ाकिर

Gazal तेरे आगे चांद पुराना लगता हैं

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता हैं तेरे आगे चांद पुराना लगता हैं तिरछे तिरछे तीर नजर के चलते हैं सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता हैं आग का क्या हैं पल दो पल में लगती हैं बुझते बुझते एक ज़माना लगता हैं सच तो ये हैं फूल का दिल भी छल्ली हैं हसता चेहरा एक बहाना लगता हैं Gazal by  कैफ़ भोपाली

Gazal चौदवी की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा

कल चौदवी की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा कुछ ने कहा ये चांद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा हम भी वही मौजुद थे हम से भी सब पूछा किये हम हंस दिये, हम चुप रहे,मंजूर था पर्दा तेरा इस शहर में किससे मिले, हम से तो छूटी महफ़िले हर शख्स तेरा नाम ले,हर शख्स दिवाना तेरा कुचे को तेरे छोडकर जोगी ही बन जाये मगर ज़ंगल तेरे, परबत तेरे,बस्ती तेरी,चेहरा तेरा बेदर्द सुनी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी गज़ल आशिक़ तेरा, रूसवा तेरा,शायर तेरा,इंशा तेरा Gazal by  इब्ने इंशा .

Gazal जिसमें खिले है फूल वो डाली हरी रहे

बदला ना अपने आपको जो थे वही रहे मिलते रहे सभी से मगर अज़नबी रहे दुनिया ना जीत पाओ तो हारो ना ख़ुद को तुम थोडी बहुत तो ज़हान में नाराज़गी रहे अपनी तरहा सभी को किसी की तलाश थी हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ मांगते चलो जिसमें खिले है फूल वो डाली हरी रहे\ Gazal by  निदा फ़ाज़ली

Gazal of Gulzar आईना देखकर तसल्ली हुई

दिन कुछ ऐसे गुजारता हैं कोई जैसे एहसान उतारता है कोई दिल में कुछ यूं संभालता हैं ग़म जैसे जेवर संभालता हैं कोई आईना देखकर तसल्ली हुई हम को इस घर में पहचानता हैं कोई दूर से गुंजते हैं सन्नाटे जैसे हम को पुकारता है कोई Gazal by  गुलज़ार

Gazal दुनिया जिसे कहते हैं जादू का ख़िलौना हैं

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का ख़िलौना हैं मिल जाये तो मिट्टी हैं खो जाये तो सोना है अच्छा सा कोई मौसम तनहा सा कोई आलम हर वक़्त आये रोना तो बेकार का रोना हैं बरसात का बादल तो दिवाना हैं क्या जाने किस राह से बचना हैं किस छत को भिगौना हैं ग़म हो कि ख़ुशी दोनो कुछ देर के साथी हैं फिर रास्ता ही रास्ता हैं हंसना  रोना हैं Gazal by निदा फ़ाज़ली

Gazal हम उस तरफ़ चले थे जिधर रास्ता न था

पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था हम उस तरफ़ चले थे जिधर रास्ता न था परछाईयों के शहर की तनहाईयां न पुछ अपना शरीक-ए-ग़म कोई अपने सिवा न था यूं देखती हैं गुमशुदा लम्हों के मोड से इस जिंदगी से जैसे कोई वास्ता न था चेहरों पे जम गई थी ख़यालों की उलझनें लफ़्जों की जुस्तजु में कोई बोलता न था Gazal by  मुमताज राशीद.

Gazal मौत भी मैं शायराना चाहता हूं

अपने होठों पर सजाना चाहता हूं आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूं कोई आसू तेरे दामन पर गिराकर बूंद को मोती बनाना चाहता हूं थक गया मैं करते करते याद तुझको अब तुझे मैं याद आना चाहता हूं छा रहा हैं सारी बस्ती में अंधेरा रोशनी को घर जलाना चाहता हूं आखरी हिचकी तेरे शानों पे आये मौत भी मैं शायराना चाहता हूं Gazal by कतील शिफ़ाई.

Gazal ये कहना है उनसे मोहब्बत है मुझको

मुझे फिर वही याद आने लगे है जिन्हे भुलाने में ज़माने लगे है सुना है हमे वो भुलाने लगे है तो क्या हम उन्हे याद आने लगे है? ये कहना है उनसे मोहब्बत है मुझको ये कहने में उनसे ज़माने लगे है क़यामत यकिनन क़रीब आ गई है 'ख़ुमार' अब तो मस्जिद में जाने लगे है Gazal by  ख़ुमार बाराबंकवी

Gazal जब किसी से कोई गिला रखना

जब किसी से कोई गिला रखना सामने अपने आईना रखना यूं उजालों से वास्ता रखना शमा के पास ही हवा रखना घर की तामिर चाहे जैसी हो इसमें रोने की कुछ जगह रखना मिलना जुलना जहा ज़रूरी हो मिलने ज़ुलने का हौसला रखना Gazal by निदा फ़ाज़ली.

Gazal तू कही भी रहे सर पर तेरे इल्ज़ाम तो है

तू कही भी रहे सर पर तेरे इल्ज़ाम तो है तेरे हाथों की लकिरों में मेरा नाम तो है मुझको तू अपना बना या न बना तेरी खुशी तू ज़माने में मेरे नाम से बदनाम तो है मेरे हिस्से में कोई ज़ाम ना आया ना सही तेरी महफ़िल में मेरे नाम कोई शाम तो है देखकर लोग मुझे नाम तेरा लेते है इसपे मैं खुश हूं मोहब्बत का ये अंजाम तो है वो सितमगर ही सही देखके उसको साबिर शुक्र है इस दिल-ए-बीमार को आराम तो है Gazal by unknown

Gazal by bahadur sah jafar दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए- यार में

लगता नहीं है जी मेरा उजडे दयार में किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में कह दो इन हसरतों से कही और जा बसे इतनी जगह कहां हैं दिल-ए-दागदार में उम्र-ए-दराज़ मांग कर लाये थे चार दिन दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में कितना है बद नसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए- यार में Gazal by  बहादुरशहा ज़फ़र

Gazal खुदकशी क्या ग़मों हल बनती

हम तो बचपन में भी अकेले थे सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे एक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के एक तरफ़ आंसूओं के रेले थे थी सजी हसरतें दूकानों पर ज़िंदगी के अजीब मेले थे आज ज़हनों दिल भुखे मरते हैं उन दिनों फ़ाके भी हम ने झेले हैं खुदकशी क्या ग़मों हल बनती मौत के अपने भी सौ झमेले हैं Gazal by जावेद अख्तर

Gazal मैं वो मक्तूल, जो कातिल ना बना

राक्षस था, न खुदा था पहले आदमी कितना बडा था पहले आस्मां, खेत, समुंदर सब लाल खून कागज पे उगा था पहले मैं वो मक्तूल, जो कातिल ना बना हाथ मेरा भी उठा था पहले अब किसी से भी शिकायत न रही जाने किस किस से गिला था पहले शहर तो बाद में वीरान हुआ मेरा घर खाक हुआ था पहले Gazal by निदा फ़ाज़ली.

Gazal ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया यूं तो हर शाम उम्मिदों में गुजर जाती थी आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया कभी तकदीर का मातम कभी दुनिया का गिला मंजिल-ए-इश्क़ में हर दाम पे रोना आया जब हुआ जिक्र जमाने में मोहब्बत का शकिल मुझको अपने दिल-ए-नादान पे रोना आया Gazal by शकिल बदायुनी.

Gazal हुस्न जब मेहेरबां हो तो क्या कीजिये

हुस्न जब मेहेरबां हो तो क्या कीजिये इश्क़ की मग्फिरत की दुआ कीजिये इस सलीक़े से उन से गिला कीजिये जब गिला कीजिये हंस दिया कीजिये दूसरों पे अगर तबसीरा कीजिये सामने आईना रख लिया कीजिये आप सुख से हैं तर्क-ए-त'अल्लुक़ के बाद इतनी जल्दी ना ये फैसला कीजिये कोई धोखा न खा जाये मेरी तरह ऐसे खुल के न सबसे मिला कीजिये अक़्ल-ओ-दिल अपनी अपनी कहें जब खुमार अक़्ल की सुनीये दिल का कहा कीजिये Gazal by ख़ुमार बाराबंकवी.

Gazal तू दिल ही हार गुज़रा हम जान हार गुज़रे

यूं तेरी रहगुज़र से दिवानावार गुज़रे कांधे पे अपने रख के अपना मज़ार गुज़रे बैठे रहे हैं रास्ता में दिल का ख़ंडर सजा कर शायद इसी तरफ़ से एक दिन बहार गुज़रे बहती हुई ये नदिया घुलते हुए किनारे कोई तो पार उतरे कोई तो पार गुज़रे तू ने भी हमको देखा हमने भी तुमको देखा तू दिल ही हार गुज़रा हम जान हार गुज़रे Gazal by मीना कुमारी