आँखों में रहा, दिल में उतर कर नहीं देखा


आँखों में रहा, दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नहीं देखा

बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
एक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा

जिस दिन से चला हूँ मेरी मंजिल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनेँ
जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा


आँखों में रहा, दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नहीं देखा


बशीर बद्र

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